ICSE Class 10 Hindi • Sahitya Sagar (Poems) • Chapter 4
पाठ का परिचय (Introduction):
'वह जन्मभूमि मेरी' कविता एक अत्यंत भावपूर्ण और देशप्रेम (Patriotism) से ओत-प्रोत रचना है। इसमें कवि ने भारत की भौगोलिक महानता, प्राकृतिक छटा, और गौरवशाली सांस्कृतिक इतिहास का मनमोहक चित्रण किया है। कवि अपनी जननी-जन्मभूमि को स्वर्ग से भी महान बताता है और गर्व से कहता है कि इसी पवित्र धरती पर श्रीराम, सीता, गौतम बुद्ध और कृष्ण जैसी महान आत्माओं ने जन्म लेकर इसे पुण्यभूमि (Holy Land) बनाया है।
शब्दार्थ: नित = हमेशा; सिंधु = समुद्र/हिंद महासागर; त्रिवेणी = प्रयागराज में गंगा-यमुना-सरस्वती का संगम; छहर रही = छिटक रही/बिखर रही; पुण्यभूमि = पवित्र धरती; स्वर्णभूमि = सोने की धरती (Golden Land)।
प्रसंग: इस पद्यांश में कवि ने भारत की विशाल और अद्भुत भौगोलिक स्थिति का गौरवशाली वर्णन किया है।
व्याख्या: कवि अपनी भारतमाता की सुंदरता का बखान करते हुए कहते हैं कि मेरी जन्मभूमि के उत्तर में दुनिया का सबसे ऊँचा पर्वतराज हिमालय किसी 'रक्षक' या 'मुकुट' (Crown) की तरह आकाश को चूमता हुआ गर्व से खड़ा है। दक्षिण में उसके चरणों के नीचे विशाल हिंद महासागर (सिंधु) प्रसन्नता से झूमता हुआ उसके पैर धोता रहता है। इस पवित्र धरती पर गंगा, यमुना और सरस्वती (त्रिवेणी) जैसी पवित्र और मोक्षदायिनी नदियाँ लहरें मारती हुई बहती हैं। इन सबके कारण इस देश के कदम-कदम (पग-पग) पर एक अनुपम (निराली) और जगमगाती हुई प्राकृतिक सुंदरता बिखर रही है। ऐसी पवित्र और कीमती (स्वर्ण) धरती ही मेरी प्यारी जन्मभूमि और मातृभूमि है।
शब्दार्थ: अमराइयाँ = आम के बग़ीचे (Mango groves); मलय पवन = मलय पर्वत (दक्षिण) से आने वाली चंदन से युक्त ठंडी और सुगंधित हवा; धर्मभूमि = धर्म का पालन करने वाली धरती; कर्मभूमि = कर्म का प्रेरणा स्रोत।
प्रसंग: इसमें कवि ने भारतवर्ष के मोहक वन, पक्षी और सुगंधित हवाओं का वर्णन किया है।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि मेरी जन्मभूमि की पहाड़ियों से अनेक मीठे जल वाले झरने (Waterfalls) झरते रहते हैं जो इसकी सुंदरता को चार चाँद लगा देते हैं। यहाँ जंगलों की झाड़ियों में सुंदर चिड़ियाँ मस्ती में चहचहाती रहती हैं। यहाँ आमों के घने बाग (अमराइयाँ) हैं जिनमें छिपी हुई कोयल अपनी मीठी आवाज़ (कूक) से हर दिल को जीत लेती है। यहाँ दक्षिण दिशा (मलय पर्वत) से चंदन की खुशबू से भरी शीतल हवा बहती है, जो हमारे तन (शरीर) और मन दोनों को ताज़गी और शांति (सँवारती) से भर देती है। ऐसी धरती जहाँ लोग धर्म का पालन करते हैं (धर्मभूमि) और निरंतर अच्छे कर्म (कर्मभूमि) में लगे रहते हैं, वह और कोई नहीं, मेरी जन्मभूमि भारत है।
शब्दार्थ: रघुपति = भगवान राम; पुनीत = पवित्र; सुयश = अच्छी प्रसिद्धि (Glory); जग = संसार; दीया दिखाया = ज्ञान का प्रकाश फैलाया (Enlightened)।
प्रसंग: कविता के अंतिम भाग में कवि ने भारत की महान सांस्कृतिक विरासत (Cultural Heritage) पर गर्व व्यक्त किया है कि यह उन महान आत्माओं की धरती है जिन्होंने पूरे विश्व का मार्गदर्शन किया।
व्याख्या: कवि इस धरती की महानता को अपने चरम पर ले जाते हुए कहते हैं कि मेरी मातृभूमि इसलिए
भी सबसे महान है क्योंकि इसे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और माता सीता (त्याग और पवित्रता की प्रतीक) ने
जन्म लेकर पवित्र किया है। इसी धरती पर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बंसी (बांसुरी) के प्रेम-स्वर गूँजाए और
कुरुक्षेत्र के मैदान में पूरी दुनिया को कर्मयोग का पवित्र ज्ञान देने वाली
'श्रीमद्भगवद्गीता' सुनाई।
यही वह महान धरती है जहाँ महात्मा गौतम बुद्ध (सिद्धार्थ) ने जन्म लिया और इस धरती का गौरव (सुयश) पूरे विश्व
में बढ़ाया। बुद्ध ने ही पूरी दुनिया (जग) को जीव-दया, अहिंसा (Non-violence) और 'पंचशील' का पाठ पढ़ाया तथा
अज्ञान के अंधेरे में भटकती दुनिया को ज्ञान का प्रकाश (दीया) दिखाकर सही रास्ता दिखाया। इस धरती ने धर्म की
रक्षा के लिए युद्ध भी लड़े (युद्धभूमि) और शांति का पाठ भी पढ़ाया (बुद्धभूमि)। ऐसी ही अतुलनीय धरती मेरी
जन्मभूमि है जिस पर मुझे अत्यंत गर्व है।
प्रश्न 1: कवि ने भारत के मस्तक (उत्तर) और चरणों (दक्षिण) का वर्णन किस प्रकार किया है?
उत्तर: कवि ने भारत के मस्तक (उत्तर दिशा) और चरणों (दक्षिण दिशा) का बड़ा ही गौरवशाली और जीवंत (Personified) वर्णन किया है। कवि कहते हैं कि भारतमाता के मस्तक के स्थान पर दुनिया का सबसे ऊँचा पर्वतराज 'हिमालय' एक रक्षक और मुकुट के रूप में आकाश को चूमता हुआ गर्व से खड़ा है। दूसरी ओर, दक्षिण दिशा में विशाल 'सिंधु' (हिंद महासागर) नित्य ही भारतमाता के चरणों के नीचे पड़ा हुआ प्रसन्नता से झूमता है और अपनी लहरों से उसके चरण पखारता (धोता) है। इस प्रकार उत्तर और दक्षिण दोनों ही भारत की महान भौगोलिक सुरक्षा और प्राकृतिक वैभव का बखान करते हैं।
प्रश्न 2: कवि ने अपनी जन्मभूमि को 'धर्मभूमि' और 'कर्मभूमि' क्यों कहा है?
उत्तर: कवि अपनी जन्मभूमि भारत को 'धर्मभूमि' इसलिए कहता है क्योंकि यहाँ आदिकाल से ही लोगों ने सत्य, अहिंसा, त्याग और परोपकार जैसे धर्मों का पालन किया है। यहाँ अनेक धर्मों और संप्रदायों का उदय हुआ है और सब सद्भाव से रहते हैं। दूसरी ओर, इसे 'कर्मभूमि' इसलिए कहा गया है क्योंकि यहाँ के लोगों ने हमेशा आलस्य त्याग कर पुरुषार्थ (कठोर परिश्रम) किया है, और स्वयं श्रीकृष्ण ने गीता में निष्काम 'कर्म' का संदेश इसी धरती पर दिया था, जो हमें बिना फल की इच्छा के अपना कर्म (कर्तव्य) करते रहने की प्रेरणा देता है।
प्रश्न 3: "गौतम ने जन्म लेकर, जिसका सुयश बढ़ाया" – इस पंक्ति का क्या आशय है और बुद्ध ने जग को क्या सिखाया?
उत्तर: इस पंक्ति का आशय यह है कि भारत की पवित्र धरती वह महान भूमि है जिसे 'महात्मा गौतम बुद्ध' (राजकुमार सिद्धार्थ) जैसे महापुरुष के जन्म लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त करने के बाद अपना पूरा जीवन मानव कल्याण में लगा दिया, जिससे पूरे विश्व में भारत का सुयश (प्रसिद्धि/Glory) और सम्मान बढ़ गया। गौतम बुद्ध ने स्वार्थ, हिंसा और अज्ञान से भरी इस दुनिया (जग) को सभी जीवों के प्रति 'दया', करुणा (Empathy) और 'अहिंसा' का पाठ पढ़ाया और उन्हें सत्य तथा शांति का मार्ग (ज्ञान का दीया) दिखाया।